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Monday, February 25, 2019

कविता


इस कदर वाकिफ है मेरी कलम मेरे जज़्बातों से, 
अगर मैं इश्क़ लिखना भी चाहूँ तो इंक़लाब लिखा जाता है।
~ भगत सिंग

Tuesday, December 18, 2018

नज्म

नज्म

मुझसे इक नज़्म का वादा है,
मिलेगी मुझको
डूबती नब्ज़ों में,
जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिए चाँद,
उफ़क़ पर पहुंचे
दिन अभी पानी में हो,
रात किनारे के क़रीब
न अँधेरा, न उजाला हो,
यह न रात, न दिन
ज़िस्म जब ख़त्म हो
और रूह को जब सांस आए
मुझसे इक नज़्म का वादा है मिलेगी मुझको....
#गुलजार #hindi #poem #eaksharman

Friday, October 12, 2018

Saturday, September 29, 2018

Tuesday, January 9, 2018

अभी तो सिर्फ कागज़ पर लिखे अलफ़ाज़ हैं


अभी तो सिर्फ कागज़ पर लिखे अलफ़ाज़ हैं 
तू गुनगुना दे गर तो मुकम्मल ये ग़ज़ल हो जाये

यूँ तो मंज़िल की तमन्ना में ही निकले थे घर से 
गर तू हमसफ़र बने तो रास्ता ही मंज़िल हो जाये

बिखरना भी कई दफा कितना हसीन होता है
मैं लहर लहर बिखर जाऊं गर तू समंदर हो जाये

तेरे चश्म-ए-आईने में देखा है अक्सर अक्स अपना
दिल में भी गर उतर जाऊं तो मुकामे-ज़िन्दगी हासिल हो जाये

इक दूजे से दूर ज़िंदा रहने की फकत रस्म ही निभा रहे हैं
रूह रूह में समा जाये तो जिस्म को मायने मिल जाये

आपकी गुज़ारिश पर एक के बाद एक शेर लिख डाले
गर आपकी नज़रे-इनायत हो तो इनका नाम ग़ज़ल हो जाये
~ अनामिक

Wednesday, December 27, 2017

आत्‍मपरिचय हरिवंशराय बच्‍चन

मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,

फिर भी जीवन में प्‍यार लिए फिरता हूँ;

कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर

मैं सासों के दो तार लिए फिरता हूँ!


मैं स्‍नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,

मैं कभी न जग का ध्‍यान किया करता हूँ,

जग पूछ रहा है उनको, जो जग की गाते,

मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!


मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,

मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ;

है यह अपूर्ण संसार ने मुझको भाता

मैं स्‍वप्‍नों का संसार लिए फिरता हूँ!


मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,

सुख-दुख दोनों में मग्‍न रहा करता हूँ;

जग भ्‍ाव-सागर तरने को नाव बनाए,

मैं भव मौजों पर मस्‍त बहा करता हूँ!


मैं यौवन का उन्‍माद लिए फिरता हूँ,

उन्‍मादों में अवसाद लए फिरता हूँ,

जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,

मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ!


कर यत्‍न मिटे सब, सत्‍य किसी ने जाना?

नादन वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना!

फिर मूढ़ न क्‍या जग, जो इस पर भी सीखे?

मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भूलना!


मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,

मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;

जग जिस पृथ्‍वी पर जोड़ा करता वैभव,

मैं प्रति पग से उस पृथ्‍वी को ठुकराता!


मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,

शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,

हों जिसपर भूपों के प्रसाद निछावर,

मैं उस खंडर का भाग लिए फिरता हूँ!


मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,

मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;

क्‍यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,

मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!


मैं दीवानों का एक वेश लिए फिरता हूँ,

मैं मादकता नि:शेष लिए फिरता हूँ;

जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,

मैं मस्‍ती का संदेश लिए फिरता हूँ!

Monday, November 27, 2017

Saturday, September 2, 2017

क़ुर्बतें होते हुए भी फ़ासलों में क़ैद है

#hindi

क़ुर्बतें होते हुए भी फ़ासलों में क़ैद हैं

#सलीम_कौसर

क़ुर्बतें होते हुए भी फ़ासलों में क़ैद हैं
कितनी आज़ादी से हम अपनी हदों में क़ैद हैं
कौन सी आँखों में मेरे ख़्वाब रौशन हैं अभी
किस की नींदें हैं जो मेरे रतजगों में क़ैद हैं
शहर आबादी से ख़ाली हो गए ख़ुश्बू से फूल
और कितनी ख़्वाहिशें हैं जो दिलों में क़ैद हैं
पाँव में रिश्तों की ज़ंजीरें हैं दिल में ख़ौफ़ की
ऐसा लगता है कि हम अपने घरों में क़ैद हैं
ये ज़मीं यूँही सिकुड़ती जाएगी और एक दिन
फैल जाएँगे जो तूफ़ाँ साहिलों में क़ैद हैं
इस जज़ीरे पर अज़ल से ख़ाक उड़ती है हवा
मंज़िलों के भेद फिर भी रास्तों में क़ैद हैं
कौन ये पाताल से उभरा किनारे पर 'सलीम'
सर-फिरी मौजें अभी तक दाएरों में क़ैद हैं